यादों की गठरी खोलते ही…….
इंग्लिश बुक, हिंदी बुक, साइंस बुक, सोशल साइंस बुक, मैथ्स बुक, डायरी और पेंसिल बॉक्स। रात्रि भोजन के बाद आखिरी काम यही रहता था की सारी किताबें समेट कर बस्ते में रख दो। निद्रा देवी अपने चरम सीमा पर रहती थी लेकिन ये काम निपटाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य हुआ करता था। पुराने कमरे की मेज पर रखी कुछ पुरानी बचपन की किताबें पड़ी थी। आज अचानक बड़े आराम से सम्हालते हुए उठाया और धूल की एक परत को साफ़ की। ऐसा लगा मानो वो धूल की परत ने एक पर्दा ही हटा दिया हो। वो पुरानी किताब नयी सी लगने लगी और पुरानी यादें एकदम से ताजा हो गयी।
परदे के हटते ही मानो वो सब हरकतें आँखों के सामने जीवित हो गयी। सुबह उठना, बेमन से स्कूल जाना, गर्मी छुट्टियों की राह ताकना, छुट्टियाँ होते ही माँ से कहीं घूमने जाने की ज़िद्द करना, बिजली का बार बार जाना, लैंप जला कर छत पे पढ़ना, नए क्लास में जाने के पहले नयी किताबें ले कर उसे कपडे पहनाना अर्थात उन् पर कवर चढ़ाना। ये सब अपने आप में एक पूरी यादों की गठरी है।
यूँ तो मेरा किताबों से एक पुराना गहरा रिश्ता सा है। फिर वो चाहे नयी प्रकाशन की खुशबू हो या पुरानी धूल की महक सबका अपना एक अलग अंदाज है। जब कमरे में किताबों को देख रही थी तो कुछ पुराने नोटबुक भी मिल गए। कुछ समय उनके साथ भी व्यतीत हुआ। यहाँ हम अपने अकेलेपन के साथ यादें साझा कर ही रहे थे की अचानक मन में एक विचित्र सा ख्याल आया। एक अद्भुत ज्ञानोदय सा हुआ।
कैसे ढेर सारी किताबें और नोटबुक समय के साथ धीरे धीरे कम होती गयी और एक समय ऐसा आया की इनकी मात्रा ऐसी कम हुई की अब तो शायद अपने पास नोटबुक खोजने पर भी न मिले। अब लिखता कौन है। आज की पीढ़ी तो सारा काम महान ग्यानी देवता कंप्यूटर के जरिये करती है। ये कलम और कॉपी की तो जगह ही ले ली इसने।
यूँ तो मेरी प्रवृत्ति एक लेखक और पाठक की है। झूठ नहीं कहूँगी लेकिन आज भी किताबों को पढ़ कर जो संतुष्टि मिलती है वो लैपटॉप के सामने बैठ कर जरा भी एहसास नहीं होता। पर समय के साथ बदलते हालात और व्यवस्था के अनुसार इंसान को भी ढलना पड़ता है। बस यही एक मज़बूरी है जो इन तकनीकों के सामने हमे आश्रित कर देती है नहीं तो टेबल लैंप जला कर हाथ में किताब लेकर पढ़ने का वो सुख ही एक अलग युग की अनुभूति है।
देखते देखते नज़र पड़ी एक अंग्रेजी की किताब पर जिसमे भरे थे खजाने की तरह अनेकों कहानियाँ। कहानियों पर आंखें जैसे ही टिकी याद आया वो दौर जब अंग्रेजी की क्लास में रीडिंग करने के लिए हर बच्चे को एक उम्मीद रहती थी की आज उसकी बारी होगी। अगर उसकी बारी होती तो उस बच्चे की चेहरे की चमक मानो उगते सूरज की तरह एक लम्बी मुस्कान लिए और जो उसे वो मौका न मिले तो ढलते सूरज की तरह चेहरा शांत पड़ जाता। हर बच्चे की तरह मैं भी काफी उत्साहित रहती थी। एक अलग ही सी हँसी आयी चेहरे पर उस पल को याद करते हुए।
उन् किताबों में छपी वो कहानियां कितनी सच लगती थी। उस वक़्त. पढ़ते पढ़ते मन खो जाता था उन् कहानियों में। वो ह्रदय के अंदर तक छू जाने वाली कहानियां अब कही मिलती नहीं। न ही मिलता है अब वो एहसास कहानियों को पढ़ कर। बचपन दौर ही ऐसा होता है जब बालमन हर बुराई से कोसो दूर रह कर एक अलग सी पवित्रता से पूर्ण हो कर हर कार्य को निश्छलता से करता है। अब तो दूर दूर तक न वो निर्मलता नज़र आती है न ही वो निश्छलता प्रतीत होती है आज के समय में कही।
ये ज़िन्दगी भी कितनी अजीब है। अपने साथ अच्छे लम्हें लाती है मगर कुछ वक़्त के लिए ही। जैसे जैसे वक़्त बीतता जाता है कई चीज़ें बदल जाती है। इंसान के व्यवहार से लेकर उसकी आदतें। और इस बदलाव को हम ज़िन्दगी के हर मोड़ पर स्वीकार करते चले जाते हैं। पर उन बदलाव से निकल कर आती है पीछे छूटती चली जाती हुई यादें। जब कभी समय मिलता है तो खुलती है ये गठरी याद दिलाने के लिए की हाँ एक वक़्त था जब ऐसा भी कुछ होता था। और ये बचपन तो बेशक ही इंसान को उसके असलियत और मौलिकता की पहचान कराती है। उन यादों से उसे जीवन की सरलता और मधुरता याद दिलाती है।
सब कुछ कितना बदल गया है। कभी कभी मन में ये सवाल आता है की क्या ये सब कुछ बदला है हमे इस बात की याद दिलाने के लिए कि हम शायद इन बीते वक़्त में खुद को भूल गए थे। ये भागदौड़ की ज़िन्दगी, ये हर दूसरे को नीचे दिखा कर ऊपर उठना, किसी को पीछे छोड़ आगे बढ़ना, हर दूसरे को मुसीबत में डालना और अपने आप की सोचना और सारी गलतियों की वजह दुसरों को बताना। इन सब चीज़ों में लिप्त हो कर इंसान ये भूल गया था की वो एक इंसान है। उसकी अपनी एक असली पहचान है।
उसके इस धरती पर आने का एक मकसद है और वो मकसद तुच्छ नहीं। तब लगता है की शायद हमें आज इस महामारी में घर के अंदर रहने का मौका इस वजह से ही मिला है। आखिर एक अच्छी चीज़ है कि लोग यादों के पिटारे खोल कर बीती हुई ज़िन्दगी याद तो कर रहे हैं। उन्हें इस बात का ज्ञात तो होना चाहिए की वो क्या थे और क्या हो गए।
इन् यादों के भवर में मैं इतनी खो गयी थी की याद ही नहीं रहा की माँ कब से आवाज़ दे रही। “खाना भी खाना है या सिर्फ किताबो से ही पेट भरोगी?”, माँ ने कहा। “शायद मैं अपने सपने के करीब पहुंचने वाली हूँ माँ।” खाने की थाली उठाते हुए मैंने माँ से बोला और माँ की बनायीं रोटी को बड़े चाव से खाने लगी। आज मन को एक अलग सी तसल्ली मिली। शायद काफी समय से इस प्रकार की ख़ुशी मेरे ह्रदय तक पहुंच नहीं पायी थी। पर आज महज उन चंद किताबों ने चेहरे की रौनक वापस ला दी, मुस्कान की रेखा बढ़ा दी और चेहरे से होती हुई सीधी उतर गयी दिल तक। उसने दिल का दरवाजा खटखटाया और मैंने झट से द्वार खोल कर उसे जगह दे दी।